Monday, May 28, 2012

बातों में उसकी, जादूगरी थी


बातों में उसकी, जादूगरी थी
वो मेहज़बीं एक, कमसिन परी थी 

बालों में गज़रे, होटों पे लाली 
चन्दन से तन पे, साड़ी हरी थी 

पहला वो दिन था, पहली शरारत
दिल डोलता था, धड़कन डरी थी

चाहा बहुत पर, कुछ कह ना पाया 
कहने की लेकिन, कोशिश करी थी

कैसा वो दिन था, वो सामने थी
जैसे हथेली पे, किस्मत धरी थी

छूकर के जिसने, दिल की कलम में 
गजलों की खातिर, स्याही भरी थी 

दिल भूल जा अब, उसके 
फ़साने 
नादान तूने, गलती करी थी 

-ckh-

Friday, May 25, 2012

स्वछन्द ख़याल



बचपन में half-pant को उतार कर सर पर पहन लेता था 
ये सोच कर के देखने वाले को लगेगा के टोपी पहनी है
तब ये ख़याल नहीं होता था के देखने वाला कितना हंसेगा
अधनंगे मुझ मूरख को देख कर के 

चींटियों के बनाये घर को रेखाओं से घेर देता था
ये सोच कर के के चींटियाँ अपने शहर का दायर जानेगीं
और मेरे हुक्म के हिसाब से गतिविधियाँ होंगी
तब ये ख़याल नहीं होता था के दायरे तो इंसान समझता है केवल 
रेखाओं का भला चींटियाँ क्या करें ?

जाने अनजाने में जो को कीड़ा पाँव टेल दब जाता था
उसके बच्चों के दुःख को सोच कितना रोया करता था
फूल पत्तियों से भी बाते करता था 
तब ये ख़याल नहीं होता था के मोह भला कीड़े क्या समझे
मोह तो हम जैसों का पिंजरा था 

दादी के पूजा के घर से मिश्री माखन चुरा कर खाता था
दोपहर में सब सो जाता मैं जग कर सोचा करता था
आसमान में तारे लगाने बूढा बाबा कब आएगा
तब ये ख़याल नहीं होता था के सूरज तारे दूर बहुत थें 
बूढा बाबा कोई इश्वर थोड़ी है 


कहना चाहा बहुत कह न पाया कभी


कहना चाहा बहुत कह न पाया कभी 
और फिर चैन से रह न पाया कभी 
 
कुछ मुलाक़ात में आप क्या हो गए
क्यूँ भला फासले सह न पाया कभी 

अलविदा की घड़ी जैसे थम सी गयी 
वक़्त उससे निकल बह न पाया कभी 




PS: The meter of this Gazal is same as that of the famous gazal in the voice of Jagjit ji: "aap ko dekh kar dekhata reh gaya".

मेरी हर बात पे हाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं


मेरी हर बात पे हाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं 
मेरे जैसा ही जहाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं

कभी बागीचे से पूछो जीस्त के फलसफे  
हर सु मौसम मेहरबाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं

तू न समझा के लिखा करता था इतना क्यूँ भला 
तू भी उतना परेशाँ हो ये ज़रूति तो नहीं

नीम की छाँव में सोया सोचा करता हूँ तुझे 
कोई मुझपर मेहरबाँ हो ये ज़रूरती तो नहीं 


सोच कर लाल हुआ चेहरा 'चक्रेश' जो उसे 
आज वो भी पशेमाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं 

समंदर के राहें तकता जीवन


जाने क्या क्या लिखते आये
जाने क्या क्या कहता दिल था 
यूँ तो कोई बात नहीं थी 
फिर भी बहता रहता दिल था |

स्याही को भी दोष दे बैठा
पन्नों को भी फाड़ के देखा 
वो जो आतुर थें उठने को
उन मुर्दों को गाड़ के देखा
फिर भी शायद तू न समझा 
एक चुभन जो सहता दिल था | 


कैसी खलिश वो कैसी चुभन थी 
खिलते कमल सा खुलता जीवन 
वो जो खुदा था वो ही निहां था 
दरिया सा मिलता जुलता जीवन 
बहते थें सारे मैं भी बहता 
समंदर के राहें तकता जीवन |

Wednesday, May 23, 2012

----ग़ालिब ---


कोई उम्मीद बर नहीं आती 
कोई सूरत नज़र नहीं आती 


मौत का एक दिन मु'अय्यन है 
नींद क्यों रात भर नहीं आती 


आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी 
अब किसी बात पर नहीं आती 


जानता हूँ सवाब-ए-ता'अत-ओ-ज़हद 
पर तबीयत इधर नहीं आती 


है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ 
वर्ना क्या बात कर नहीं आती 


क्यों न चीख़ूँ कि याद करते हैं 
मेरी आवाज़ गर नहीं आती 


दाग़-ए-दिल नज़र नहीं आता 
बू-ए-चारागर नहीं आती 


हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी 
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती 


मरते हैं आरज़ू में मरने की 
मौत आती है पर नहीं आती 


काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब' 
शर्म तुमको मगर नहीं आती 

ये ज़रूरी तो नहीं


मेरी हर बात पे हाँ हो ये ज़रूरी तो नहीं 
मेरे जैसा ही जहां हो ये ज़रूरी तो नहीं 

कोई इलज़ाम दे रहा था हमें


कोई इलज़ाम दे रहा था हमें
फिर नया नाम दे रहा था हमें 

मांगता था तमाम उल्फत मेरी 
और अच्छे दाम दे रहा था हमें 

-ckh-

कोई आवाज़ क्यूँ लगाता है


कोई आवाज़ क्यूँ लगाता है
हाथ दे कर मुझे बुलाता है

क्या भला चाहिए ज़माने को
आज अपना मुझे बताता है

फिर से अपनों ने कर दिया मुजरिम  
गैर इलज़ाम कब लगाता है

मैं नहीं चाहता मगर फिर भी
चाह कर वो मुझे सताता है

आते देखा था दूर से उसको
नामाबर पर इधर न आता है

वक़्त इतना नहीं के सोचूँ मैं
कौन दरवाज़े खटखटाता है

ऐ खुदा! मानता हूँ मैं तुझको
पर तू क्या है नज़र न आता है

जिंदगी खैर बीत जायेगी
मर के देखें के चैन आता है

अब यहाँ दिल कहाँ रहा उसका
कब्र पर जो तू सर झुकाता है ?




 -ckh-

Monday, May 21, 2012

कैसे कैसे रंग जीवन - my last poem

कैसे कैसे रंग जीवन
देखो दिखलाता है 
एक में भी जीने न दे | 
कभी पास लेके आये
कभी दूर किये जाए 
दोस्तों में रहने न दे ||

रात आधी बीत चली
रात आधी बाकी है
चंदा को तकता रहूँ
ये दो नयना सुबह के
ख्वाब लिए जगते है
ख्वाब मुझे सोने न दे ||

सांस सांस गिनता जाता
खुद से ही बतियाता
घड़ियों के कांटे चुभें
आस पास कौन है जो
दर्द दिल का समझेगा
आईना चुप रहने न दे ||

जाने क्या पहेली है
जीवन है कैसी डोरी
जीते जी सुलझ न सके
कहते हैं के मर के भी
गाँठ नहीं खुलती है
कौन है जो खुलने न दे ||

वेद ग्रथ सार समझा
दो और दो को चार समझा
पर न समझा खुद को अभी
गीत ग़ज़ल काव्य में
'चक्रेश' ही ढूँढता हूँ
कोई क्यूँ दिखाई न दे

-ckh-

Thursday, May 17, 2012

दिल जिसे याद करके बिखरता रहा



दिल जिसे याद करके बिखरता रहा 
बारहाँ वो ग़ज़ल में उतरता रहा 

सोचता था के कह दूं तमन्ना मेरी
पर ज़माने का डर था मैं डरता रहा 

क्यूँ  नहीं आज वो पास मेरे यहाँ 
फिर खुदा से शिकायत ये करता रहा 

जिंदगी जो समंदर सी होती रही 
मैं किनारों से लगकर गुजरता रहा 

Saturday, May 12, 2012

हर कोई इक सफ़र में है


हर कोई इक सफ़र में है 
ज़िन्दगी की डगर में है

मंजिलों की नहीं खबर
काफिला रहगुज़र में है

फिर वही रंग-ओ-बू यहाँ 
फिर तमाशा शहर में है 

आधियाँ थम ही जायेंगी 
हौसला हर सज़र में है 

Friday, May 11, 2012

तू न आया न तेरा सलाम आया

तू न आया न तेरा सलाम आया
चिट्ठियाँ ना लिखीं ना पयाम आया

हंस के बोला करो खिलखिलाया करो
आज उसका कहा कुछ तो काम आया

छिड़ गयी जो कहानी पुरानी तो फिर
याद मुझको वो बचपन तमाम आया

आज सारा शहर देख आया हूँ मैं
याद फिर भी अभी तक न नाम आया

सर्द रातों में मुझको जलाते हैं वो
जीतेजी ना सही मर के काम आया

लो ग़ज़ल हो गयी ताज़ी ताज़ी कोई
मेरे जानिब जो चलकर के जाम आया

meter:
२१२ २१२ २१२ १२२

-ckh-

Tuesday, May 8, 2012

तुम्ही कह दो के मैं उनसे क्या कह दूं ?



कुछ शब्द बादलों से मिलते हैं
कुछ आसमाँ से
कुछ फूलों से, कलियों से, मौसम और बहारों से

कुछ शब्द नदियों से मिलते हैं
कुछ झीलों से
कुछ समंदर से, लहरों से, चट्टानों और साहिलों से

पर कुछ ऐसे भी शब्द है मेरे हमदम
जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लबों के तबस्सुम पर हैं
जो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी बातों में, तुम्हारी आँखों में
तुम्हारे चेहरे पर और तुम्हारी जुल्फों से मिलते हैं

तुम सैकड़ों मैकदों का मद लिए अपने आँखों में
तुम सातों समन्दरों की उफान लिए अपनी आँखों में
तुम ग़ज़लों की किताब हो
तुम काव्य का स्वरुप हो

जो शब्द तुममे मिलते हैं
वो शब्द कहीं और नहीं मिलते
तुम पास होती हो, तो ग़ज़ल होती है
तुम दूर होती हो तो ग़ज़ल होती है

लोग मुझसे अक्सर पूछा करते हैं
के मैं शायर कैसे बना ?
तुम्ही कह दो के मैं उनसे क्या कह दूं ?

-ckh-

Friday, May 4, 2012

चश्म-ऐ-नम जब धुवाँ धुवाँ होगी


चश्म-ऐ-नम जब धुवाँ धुवाँ होगी
तब मेरी हर ग़ज़ल जवाँ होगी

लडखडाती है गर जुबाँ अबतक
बात आँखों से ही बयाँ होगी

फासले ही अगर ये मिट जाएँ
फिर वो दिल में खलिश कहाँ होगी

अर्श पर टूटते सितारों में
तेरी सूरत भी तो अयाँ होगी

आज 'चक्रेश' चुप यहाँ बैठे
सोचता है के वो कहाँ होगी

Wednesday, May 2, 2012

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,

हम दुकान सजाते रहे और बाज़ार उठ गया,
कुछ सामान दिखाते रहे और खरीदार उठ गया ;

हाथ पकड़ के हमने उसे बिठाया बार बार,
हाथ झटक के वो मेरा, बार बार उठ गया ;

कोतवालों ने किया घर नीलाम कुछ ऐसे ,
रूठ कर हिस्से से अपने, हकदार उठ गया ;

डूबकर उसकी ग़ज़ल में खोएं इस कदर ,
जागने से पहले ही वो फनकार उठ गया ;

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...