Monday, October 24, 2011

ये कैसा पहिया है जीवन

ये कैसा पहिया है जीवन
जिसको हम अपना कहते हो
वो पास में रहकर भी हमसे
कितना अनजाना होता है

जब बात पुरानी याद आये
और दिल को अपने छू जाए
तो दीवारों पर रखकर के
सर अपना दिल कितना रोता है

हम कौन के सफ़र राही हैं
है कौन सी मंजिल अपनी आखिर
हर राहगुजर पर बैठा पाया
एक नया समझौता है

कोई गैर अगर अपना है यहाँ
तो खैर सफ़र का क्या कहना
हर शख्स मिला अपने जैसा
मेरे सा भार ही ढोता है

1 comment:

रविकर said...

सुंदर कविता, सुंदर भाव।
दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...