Saturday, March 19, 2011

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

अपने ही आज दिल में खंजर उतारते हैं

बिखरा पड़ा वतन है सब घर सँवारते हैं



रखूँ क्यूँ मुह पे परदे झुका के सर मैं चलूँ क्यूँ

यहाँ लोग संसदों में कुरसी से मारते हैं



किया कुछ तो होगा मैंने सजा कौन देगा लेकिन ,

इतिहास कुल वधू के कपड़े उतारते हैं ..



लो मर गया परिंदा फडफडाता हुआ परों को ,

भूखे खड़े दरिन्दे छूल्हे निहारते हैं

2 comments:

संजय भास्कर said...

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|

shephali said...

achi prastuti
satik shabd

चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर

तू किसी शोख़ का सिंगार कर रख भी दे ये ख़ामोशी उतार कर तीरगी ये पल में टूट जायेगी  चल दोबारा ज़िन्दगी से प्यार कर एक ही नहीं कई शिकायतें ...